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Hindi kahani- गोटे वाली चुनरी 

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Hindi kahani 

सबकी आंखों में रंग उड़ी, बेतरतीब सितारों वाली चुनरी खटकती थी, लेकिन उसे सिर पर ओढ़े मधु कीआश्वस्ति, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान बहस करने से रोक देती थी। मधु को उस...

यह से क्या लगाव था, यह सबके लिए पहेली थी। क्या मधु, आज भी यही चुनरी पहन ली तुमने?' हैरान कम, परेशान ज्यादा दिख रहीं सासू मां ने शिकायती लहजे में कहा- 'जानती हो न, आज कितने रिश्तेदार और दूसरे
मेहमान आने वाले हैं?'

लेकिन मधु हमेशा की तरह आज भी बस मुस्करा दी और पूजा की तैयारियों में जुट गई। वैसे सासू मां को हैरानी होनी भी नहीं चाहिए थी। व्रत-उपवास हो या तीज-त्योहार, मधु हर बार यही चुनरी ओढ़ती है। लेकिन उनको ही नहीं ससुराल में सभी सदस्यों को हर बार इससे परेशानी जरूर होती है।

सासू मां तो कितनी बार टोक चुकी हैं हैं उसे- 'पुरानी-सी
इस गोटे वाली चुनरी में जाने कौन-से हीरे-मोती जड़े हैं! कभी तो कुछ नया और फैशनेबल पहन लिया कर।
पति के मन में भी शिकायत कुछ कम नहीं थी। वे भी कई बार कह चुके हैं- 'हर ख़ास दिन पर एक-सी ही लगती हो तुम, वही रंग वही ढंग।

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हां, इतने सालों में इस चुनरी के रंग जरूर कुछ फीके पड़ गए हैं।' देवरानी को तो यह उसका पागलपन ही लगता है। 'इतने बड़े घर की बहू होकर भी जाने क्यों हर बार गोटे की इसी चुनरी को ओढ़ने का बहाना ढूंढती रहती हैं आप? भाभी, आपको तो समझना ही मुश्किल है।' यह बात तो देवरानी ने अपनी शादी के दूसरे दिन ही कह दी थी,

जब शादी की रस्मों में शामिल जेठानी को उसने हर रिवाज़ निभाते हुए इसी चुनरी को पहने देखा। लेकिन वो तो हर बार बस मुस्कराकर रह जाती। इस मुस्कराहट के साथ जो सुकून उसके चेहरे पर दिखता है, वो सभी घरवालों के लिए पहेली जरूर था।

शिकायतें और सलाहें लाजिमी भी थीं। बेतरतीबी से लगा गोटा, हल्का पड़ा रंग और चुनरी के बीच में आड़े-टेढ़े धागों से जैसे-तैसे बनाए गए बूटे कुछ ख़ास था भी तो नहीं इस चुनरी में लेकिन शादी के बाद इसे ओढ़कर ही ससुराल की देहरी में पांव धरने वाली घर की बड़ी बहू मधु, इतने बरसों में रीति-रिवाज निभाने के किसी भी ख़ास मौके पर इसे पहनना नहीं भूली।

आख़िर वह भूलती भी तो कैसे...? बिन मां की इस बेटी की परवरिश करने वाले पिता के हाथों की नमी जो समाई है इसमें। बीमारी ने बचपन में ही मां का साथ छीन लिया था। पढ़ने-लिखने से लेकर घर बसाने तक, सबको यही कहते सुना कि जाने कैसे अगले घर में रिश्ते-नाते
निभाएगी? बिन मां की बेटी है,

संस्कार और सीख दे भी तो कौन? लेकिन यह पिता की दी सीख, समझ और संस्कारों का ही नतीजा था कि इस बड़े घर के लोगों ने ख़ुद उसके लिए रिश्ता भेजा, जहां आज हर जिम्मेदारी को अच्छी तरह निभा रही है, मधु। अच्छी तरह याद है

उसे कि कैसे पापा उसे बड़ा करते हुए मां बन गए थे। कोई कमी ना रह जाए इस फ़िक्र में उसके विचार-व्यवहार को थोड़ा ज्यादा ही तराशा। तभी तो अपनी इस बिटिया को संस्कार ही नहीं आत्मविश्वास की थाती भी थमाई।

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उसे आज भी याद है, जब बुआजी ने उसकी शादी के समय बेमन से रीति-रिवाज़ निभाते हुए कहा था- 'बाज़ार से मधु के लिए चुनरी ले आना भैया। आजकल तो खूब मिलती हैं गोटा लगी रेडीमेड चुनरियां। इसकी मां होती तो अपने हाथों से गोटा लगा देती। हमने तो भई, दोनों बेटियों को अपने हाथों से सजाई चुनरी पहनाकर विदा किया है।

तब पापा ने सूनी आंखों से उसकी ओर देखा और बिना कुछ कहे ही वहां से चले गए। लेकिन अगले दिन जो हुआ उसे देख सारे रिश्तेदार हैरान खड़े थे। अपने हाथों से गोटे, सितारों से सजाई ये चुनरी लिए पापा खड़े थे। उस समय मधु की आंखों से आंसुओं की कितनी ही बूंदें पापा के उन हाथों में टपकी थीं,

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जिनमें सुई की चुभन के अनगिनत निशान थे। उस दिन उसे उन खुरदुरे हाथों में सबसे ज्यादा नमी महसूस हुई थी। इस नमी को छोड़ कैसे दे मधु? यही तो उसके अस्तित्व को पोस रही है। पापा की इस बेटी के लिए तो इस चुनरी के रंग सुकून और संस्कार के रंग हैं। इसका गोटा आत्मविश्वास का आभूषण है। परिधान कहां, यह तो मानो पहचान है उसकी।

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