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Hindi kahani-हेलमेट

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हेलमेट की अहमियत उनके लिए उसके रंग रूप से कहीं ज्यादा थी। उसके बदरंग होने की उन्हें परवाह नहीं थी घरेलू और जन दबाव के चलते नए हेलमेट तो आया लेकिन. उनका हेलमेट ही उनकी पहचान बन गया था..सालों पुराना, सफ़ेद रंग का। जब सड़कों पर निकलते तो उन्हें ट्रैफिक पुलिस जवान की तरह गर्व महसूस होता।

वक्त के साथ लगते स्क्रैचेस से हेलमेट भले ही बदरंग हो गया हो लेकिन वो उसे उसी शान से सिर पर लगाए
घूमते। चाहे नजदीक जाना हो या शहर के बाहर, बिना हेलमेट निकलना उनके सिद्धांतों के खिलाफ था। कई बार इस हेलमेट की वजह से परेशानी भी उठानी पड़ती। ख़ासतौर पर मेले- ठेले की भीड़भाड़ में या फिर सब्जी ख़रीदते समय झोला पकड़ने  के दौरान कई बार उन्हें भी झंझलाहट होती. पर आदत बन चकी  थी।

घर से निकलने के काफ़ी देर पहले हेलमेट सज जाता जो लौटकर सोफे पर धराशायी होने तक सिर पर टंगा रहता। श्रीमति जी को ही चिढ़ होने लगी थी क्योंकि अक्सर बाजार में उन्हें बैग । उठाने पड़ते। कितनी ही दुकानों पर हेलमेट रखकर भल जाते। दोबारा उन दुकानों पर जाकर हेलमेट उठाने के दौरान उन्हें पत्नी के ताने सुनने पड़ते  'कई बार कहा कि बाइक पर हेलमेट रखने के लिए लॉक लगवा लो ताकि ये बोझा उठाकर न घूमना पड़े।'

वो निर्विकार भाव से हां-हूं कर देते। लेकिन कई सालों की दुपहिया यात्रा में वो स्टैंड नहीं लग पाया। उन्हें भरोसा नहीं था ऐसे लॉक पर। वो कहते - 'भले ही लोगों को हेलमेट लगाने में जोर आता हो लेकिन किसी का चुराने में संकोच नहीं होगा। इसलिए परेशानी उठा सकता हूं लेकिन हेलमेट को अकेला नहीं छोड़ सकता।' कितने ही दुकानदारों ने उनका चेहरा नहीं देखा था क्योंकि वो अक्सर हेलमेट पहने ही ख़रीदारी करते थे।

सिनेमा हॉल जाना हो या किसी फंक्शन में जाना हो या किसी जरूरी मीटिंग में, हेलमेट उनके संगी-साथी की तरह साथ होता। होते हैं ऐसे कई लोग जो ज़माने की परवाह किए बिना सतत अपनी आदतों को बनाए रखते हैं। बाहर जाने से पहले श्रीमति इसी फिराक में रहतीं कि वे हेलमेट उठाना भूल जाएं लेकिन मान लो किसी दिन
सच में ऐसा होता तो रास्ते से ही वापस आकर हेलमेट उठाने की कोफ़्त ज्यादा बुरी लगती।

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वो पत्नी के गुस्से को भांपते, समझते लेकिन फिर समझाते भी कि देखो ये कितना जरूरी है। चौराहे पर हेलमेट पहनने की सलाह वाले अनाउंसमेंट सुनकर उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता और वहां खड़े लोगों को वो हिकारत के भाव से देखते। उन्हें गुस्सा भी आता कि आखिर क्यों इन लोगों को अपनी जान की परवाह नहीं है।

कई बार वो सलाह भी दे देते लेकिन प्रत्युत्तर सुनकर वो भुनभुनाते हुए बाइक स्टार्ट कर आगे बढ़ जाते। हां, जब हेलमेट नहीं होने पर किसी का चालान कटता तो उन्हें असीम शांति मिलती। साथ ही पुलिस को देख बिना हेलमेट वाले जब छिपकर भागते तो उनका मन होता कि दौड़कर उन्हें पकड़ें और चालान कटवा दें। खैर, इसी तरह जीवन चल रहा था। हेलमेट साल दर साल पुराना होने लगा था।

साथ ही श्रीमति जी के सब्र का बांध भी टटता जा रहा था क्योंकि अक्सर पुराने और सफ़ेद रंग को देखकर लोग ताना मारते। एक दिन उन्होंने चेतावनी दे दी-'अब हेलमेट बदल लीजिए। कितने रंगों में हेलमेट आते हैं। आख़िर ये सफ़ेद रंग का हेलमेट क्यों जान से लगाए फिरते हैं? लोग मुझे ट्रैफिक पुलिस वाले की बीवी कहने लगे हैं

आप जानते हैं आपकी पीठ पीछे लोग हंसी उड़ाते हैं पता नहीं क्यों आपकी जान इसी में अटकी है कह देती हूं जल्द ही नया हेलमेट दूसरे रंग का नहीं लिया तो आपके साथ में कहीं नहीं जाने वाली। उन्होंने धमकियों को नजरअंदाज कर चुके मोड़ लिया उस दिन शादी में जाने से पहले श्रीमती जी ने ऐलान कर दिया आज मैं नहीं जाने की। कम से कम शादी में तो हेलमेट पहनकर मत जाइए।

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सलीके का, स्टाइलिश हेलमेट साथ हो तो भी बात है लेकिन...ये...! आप अकेले ही जाइए।' उन्हें पहली बार बुरा लगा। शांति से सोचा तो साथियों के कटाक्ष भी याद हो आए जो वो अक्सर दफ्तर में सुना करते थे। आखिरकार उन्होंने समझौता कर लिया। श्रीमति जी को साथ लेकर ही नया हेलमेट ख़रीदने गए और मोहतरमा ने अपनी पसंद का नया ब्लैक कलर का स्टाइलिश हेलमेट खरीदवा दिया।

इससे पहले उन्होंने दुकानदार से पुराने हेलमेट के बदले कीमत कुछ कम करने की भी मांग की, जिस पर वो मुस्करा दिया और बोला - 'जनाब इसे तो कबाड़ में रख दीजिए। कई लोग अपने हेलमेट ऐसे ही छोड़ जाते हैं।' उन्होंने बुरा-सा मुंह बनाकर कहा - 'रहने दो भाई, कभी बुरे वक़्त में काम ही आएगा।' और उसे अपने साथ घर ले आए। श्रीमति जी मन की बात पूरी होने से खुश थीं।

लिहाजा हेलमेट को घर लाने दिया। मगर अब नई समस्या। नया हेलमेट सेट होने में वक़्त लगता। लिहाजा उनकी कुरकुर शुरू हो गई श्रीमति जी पर झंझलाने लगे कि देखो कितना अन्कम्फर्टेबल महसूस कर रहा हूं। फिर पराना हेलमेट पहनकर जाने लगे, तो पत्नी का पारा चढ़ गया। उन्हें यक़ीन हो गया कि ये घर में रहा तो रोज किसी न किसी बहाने यही पहना जाएगा और नया हेलमेट धूल खाएगा।

सो उन्हें कसम डालकर नया हेलमेट थमाया और पुराने को ठिकाने लगाने की मन ही मन योजना बना ली।
अगले दिन किसी तलबगार की तरह उन्होंने फिर पराने की मांग की। पत्नी ने बड़े शांत भाव से भिंडी काटते हुए कहा - 'वो अब घर में नहीं रहा।' उन्हें काटो तो खून नहीं - 'कहां गया?' 'दे दिया' - संक्षिप्त उत्तर। 'किसे?'
'कामवाली बाई के लड़के को, बिचारे ने पुरानी गाड़ी ख़रीदी थी, हेलमेट नहीं था।

उसका चालान कटता तो मैंने...!' जवाब सुनकर उन्होंने बाल ही नहीं नोंचे, बस। मन खिन्न हो गया। असीम दुख था। बस किसी से कह नहीं पाए। भारी मन से उन्होंने नया हेलमेट स्वीकार कर लिया। खैर, इस बात को एकाध महीना गजर गया था। दो दिन काम वाली बाई नहीं आई। कोई संदेश भी नहीं। तीसरे दिन आई तो दोनों पति-पत्नी को ढेरों दुआएं और धन्यवाद देने लगी।

दोनों हैरान! पता चला कि बाई के बेटे को किसी गाडी वाले ने टक्कर मार दी थी। उछलकर गिरा और सिर पत्थर से टकराया लेकिन हेलमट होने की वजह से उसकी जान बच गई। बाकी चोटें मामूला था सो दो दिन उसकी देखभाल की। एक ही बात दोहराए जा रहा कि- 'अगर उसने आपका हेलमेट नहीं पहना होता तो आज उस दुनिया उजड़ गई होती।' पति-पत्नी एक दूसरे का मंह देख रहे थे।

यक़ीन नहीं हो रहा कि उन्होंने अंजाने में एक जिंदगी बचा ली। पत्नी को अपने पर सुकून था और पति को असीम ख़ुशी और गर्व। आखिर हेलमेट से किसी को नई जिंदगी मिली थी...) ला। पत्नी को अपने किए पर सुकून था और पति को फांसी में खुशी और गर्व। आंखें उनकी हेलमेट से किसी को नई जिंदगी मिली थी.....

Hindi kahani - ढलती उदासी

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अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू करना तो ठीक है लेकिन, पूरी तरह से उलट देना कैसे संभव है मेघना इस मुश्किल को सुलझाने में अमित का साथ चाह रही थी।

अभी तक तुम तैयार नहीं हुई?' अमित ने कमरे में। आकर मेघना से कहा। अमित ! मुझे बहुत बुरा लग रहा है,' मेघना जोर से बोली। 'क्यों अब क्या हो गया?' अमित ने पूछा। 'मम्मी जी से जाने के लिए पूछा तो उन्होंने कहा, 'जल्दी आ जाना' मेघना बोली।

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'अरे! जल्दी वापिस आने को कह दिया तो कौन-सा आसमान टूट पड़ा। तुम्हें तो हमेशा मेरे घरवालों में बराई ही दिखती है अमित गुस्से से बोले।  'यह बात नहीं है अमित!' मेघना का स्वर रुंध गया। 'मैं घर में बिल्कुल बंध कर रह गई हूं। कोई नहीं सोचता कि कुछ मेरा भी मन करता होगा। एक ही शहर में मायका होने पर भी भाई की शादी के दो महीने बाद जा रही हूं, फिर भी यह कि जल्दी आ जाना।

तुम ही बताओ हम कहीं घूमने जाते हैं क्या? किसी शादी या समारोह में जाना पड़ जाए तो कैसी आफत मच जाती है।' 'हां, हां ठीक है, अब निंदा पुराण बंद करो, चलना है तो चलो' अमित ने तीखे स्वर में कहा। मेघना चुपचाप तैयार होने लगी, जानती थी कि कुछ और कहा तो अमित मुंह फुलाकर ऑफिस चले जाएंगे. फिर वह पापा मम्मी को क्या कहेगी।

उसकी भाभी सुमि के बड़े आग्रह करने पर तो आज किसी तरह अमित चलने को तैयार हए थे गाड़ी में बैठी मेघना सोच रही थी कि वह कहां फंस गई है। शादी का एक साल पूरा हो गया था पर वह ससुराल में अपने हाल पाई थी। अपनी तरफ़ से लाख कोशिश करती पर सास-ससुर, देवर, ननद हर समय कोई न कोई कमी निकाल ही देते। सारे दिन घर के काम-काज में उलझे रहने के कारण  मेघना को अपने लिए भी समय नहीं मिलता।

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उसकी पसंद नापसंद से भी किसी को कोई मतलब नहीं था। हर समय हंसती- खिलखिलाती रहने वाली मेघना के चेहरे पर अब उदासी छाई रहती। उसके उदास चेहरे को देख कभी-कभी अमित भी खीझ जाते पर उसका मन समझने की कोशिश नहीं करते। मेघना का संगीत का शौक तो जैसे ख़त्म ही हो गया था, क्योंकि ससुराल में गाना गाना तो दूर जोर से बोलने की भी मनाही थी।

एक बार रसोई में काम करते-करते वह गाने लगी तो सास ने टोक दिया 'हमारे यहां बहुएं नाच गाना नहीं करतीं।' अमित मेघना को बहुत चाहते हैं पर अपने परिवार वालों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनते। मेघना भी किसी से झगड़ना नहीं चाहती थी पर यह ज़रूर चाहती थी कि अमित तो कम से कम उसकी परेशानी समझें।

'अरे उतरो न यार!' अमित के स्वर से मेघना चौंकी। घर आ गया था। मम्मी-पापा आकाश और सुमि को दरवाजे पर खड़ा देख मेघना ने ज़बरदस्ती मुस्कराहट ओढ़ ली। सुमि ने प्यारी-सी मुस्कान के साथ दोनों के पैर छुए।
'आओ बेटा' कहकर पापा ने दोनों को गले लगाया और पकड़ कर अंदर लाए। 

आंगन में अपना हारमोनियम रखा देख उसने समि 'सुमि! मेरा हारमोनियम बाहर क्यों पड़ा है?' 'दीदी!' सुमि मुस्कुरा कर बोली, 'एक दिन मैं कमरे में गाना गा रही थी, पापा ने सुन लिया। कमरे में आकर पूछा, 'ता " गाना पसंद है' मेरे हां कहने पर पापा हारमोनियम निकाल ला" और कहा, 'यह मेरी बेटी की विरासत है, अब तुम सम्हालो।' ‘पर बाहर क्यों रखा है?' मेघना ने पूछा।

'दीदी, बजाने मे कुछ समस्या आ रही है पापा अभी दिखाने ले जाएंगे' सुमि ने कहा। मेघना ने अमित की ओर गर्व से देखा मानो कह रही हो कि अपने परिवार और मेरे बीच फासले की वजह समझो। पापा-मम्मी ने समि को बेटी-सा अपनाया, उसकी पसंद का सम्मान किया है। अमित ने नजरें झुका लीं, फिर अगले ही पल मुस्कराकर सुमि से कहा, 'इसी बात पर एक गाना हो जाए सुमि' अमित ने इस एक पंक्ति में बहुत कुछ कह दिया था।

मेघना के चेहरे पर मीठी मुस्कान छा गई और उदासी की बर्फ सदा के लिए पिघल गई। अब शायद अमित को कुछ समझाने की जरूरत नहीं थी। घर लौटते समय अमित ने गाड़ी में बैठते ही कहा, 'यह मुस्कान अब तुम्हारे चेहरे पर हमेशा बनी रहे, मैं कोशिश करूंगा।' मेघना शरमा गई। अमित ने उसकी पसंद के गाने लगा दिए। दोनों साथ-साथ गुनगुना भी रहे थे।

Hindi kahani - अपराजिता 

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अनु का संघर्ष लंबा होता जा रहा था नौकरी के लिए दर-दर भटकते एक-एक दिन भारी होता लेकिन क्या सफलता उसके भाग्य में थी या विविधा को कुछ और ही मंजूर था?

अनु को लगता है कि जैसे कहीं भीतर बहुत गहरे तक उसमें सुरंगें बन रही हैं। अंधेरी, सीलन भरी आड़ी-टेढ़ी,
लंबी सुरंगें। कितनी विवश और असहाय थी! जैसे-जैसे सुरंगों को पाटना चाहती, वे गहरी होती चली जातीं आज फिर उसके अंदर एक और सुरंग बन गई। टर्मिनेशन ऑर्डर उसके हाथों में फड़फड़ा रहा था। अब कहां जाए? क्या करे?

भाई के पास जाने का सोचते ही उसका मन कांप उठता- सारी देह थरथरा उठती। बाप का बूढ़ा और कातर चेहरा उसकी आंखों में तैर जाता। 'बेटा, जैसे भी हो अपनी नौकरी बचा लेना, भाई पर बोझ मत बनना लेकिन कहां बचा पाई वह अपनी नौकरी? अब कहां जाए वह छूटी नौकरी के भार को लेकर। कहीं भी तो उसके लिए जगह नहीं है। उसकी आंखों की कोरों से आंसुओं की धार बह निकली।

आंसुओं के वेग में वह डूबने-उतराने लगी। टर्मिनेशन ऑर्डर मिलते ही जैसे उस पर वज्रपात हो गया। अंदर ही अंदर वह चकनाचूर हो गई। मन एकदम बिखर गया। आंसू थमते ना थे, जाने कैसे जान अटकी रही। उसके साथ की टीचर्स का उत्साह और ललक देखते बनती थी। बाय...सीयू अगेन...लहराते हाथ...होंठों पर मुस्कान।

और एक वह थी- कहीं कोई नहीं था, जो उसे बुलाता...आने के लिए लिखता। वैसे भी इस कस्बे में जब उसकी नौकरी लगी, तो वह जगह उसे रास नहीं आई थी, मगर उसकी पसंद-नापसंद से क्या होना था। लेकिन साल के अंत में वह नौकरी भी जाती रही, तो वह अपनी पीड़ा के बोझ को सह नहीं पाई।

वह रात भर जमीन पर लोटती रही, नंगे फर्श से लिपटकर रोती रही- 'हे भगवान! कहां जाऊं? क्या करूं? कहां से लाऊं नौकरी?' रातभर के रुदन के बाद वह थोड़ा सामान्य हुई-कहीं न कहीं तो उसे जाना ही होगा। भारी मन से भाई के घर के लिए चल पड़ी। सड़क सामने पसरी हुई थी सुनसान...लंबी। कार्तिक के इस महीने में भी धूप अच्छी नहीं लग रही थी...।

रास्ते की थकी-हारी देह को घसीटती भारी मन लिए वह भाई के घर पहुंची। भाई आराम से अखबार पढ़ रहा था। बिना निगाह उठाए ही प्रश्न हुआ- 'कब तक छुट्टियां हैं? वहीं क्यों न रुक गईं कुछ दिन? फालत आने-जाने में किराया खर्च नहीं होता है क्या?' सारे सवाल उस पर तीखे प्रहार की तरह पड़े। सारे शरीर में बिजली की तेज लहर दौड़ गई।

जुबां पर एक कसैलापन तैर आया। मन में एक तरह की वितृष्णा। 'नौकरी छूट गई।' अनु का चेहरा सुगबुगा रहा था। 'क्या?' भाई गुर्राया। अनु को अपना भाई किसी दैत्य की तरह लगा था। 'मिल-जुलकर काम चलाना तो तुम्हें आता ही नहीं। पता नहीं तुम्हें कब तमीज़ आएगी?' वह फुफकार उठा। अनु बेहद सहम गई थी। फिर भी साहस करके उसने कहा- 'वह जगह बहुत गंदी है। वैसे भी ख़राब पॉलिटिक्स चलती है।

अकेली लड़की के लिए ठीक जगह नहीं है।' भाई का चेहरा तन गया। चेहरे पर अप्रियभाव लिए कुछ क्षण घूरता रहा। फिर तीखे, कड़वे स्वर में बोला- 'कोई जगह अच्छी बुरी नहीं होती, आदमी को काम निकालना आना चाहिए। समझी क्या? वहां क्या आदमी नहीं बसते? जानवर रहते हैं?' आंखों ही आंखों में भाई ने साबुत निगल जाने वाली जिस निगाह से देखा, वह बड़ी खौफनाक थी।

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अनु के होंठ पत्थर बन गए थे। एक शब्द नहीं निकला। हृदय विदीर्ण होने लगा था। वह रसोई में गई और दीवार के सहारे ढेर हो गई। उसका मन पीढ़ा से भर उठा था। कई दिनों तक भाई ने उससे कोई बात नहीं की। जब तक वह घर में रहता, वह भयभीत हिरणी की तरह यहां-वहां होती रहती। सिर झुकाए नौकरानी की तरह काम में लगी रहती। भाई के जाते ही सुकून अनुभव करती।

दिन जैसे चढ़ने लगता, वह गुनगुनाने लगती। भाई की गाड़ी की आवाज़ के साथ ही उसकी आकांक्षाएं दफ़न हो जातीं। भारी-भरकम बूटों की आवाज। कठोर-निर्मम, क्रूर...संपूर्ण कोमल भावनाओं को रौंदती चली जाती। भाई को देखते ही उसके मन में संन्नाटा फैल जाता। हाथ-पांव फूल जाते। एक भय उसके रक्त में, जिस्म में ज्वर की तरह दौड़ने लगता।

एक दिन भाई ने सख्त आवाज में कहा- 'क्या दिनभर बैठी-बैठी सपने देखती रहती हो। कल से नौकरी-वौकरी ढूंढो। पेपर में कॉलम देखा करो।' फिर शुरू हुआ दूर-दराज गांवों, कस्बों से लेकर महानगरों तक दौड़-भाग का अनवरत क्रम। नौकरी न मिलने पर अनु को लगता जैसे वह जघन्य अपराध करके आ रही हो। भाई सुनता और क्रोध में फुफकारता।

नफरत से उसका चेहरा विद्रूप हो जाता। भाई उसे घर में रखना नहीं चाहता। अनु दरख्वास्त लिखती जाती। वही क्रम.. इंटरव्यू, वही तेवर, वही घाघ चेहरे, कुत्सित प्रस्ताव। बार-बार स्कूल के चक्कर लगाना, गोया नौकरी न दे रहे हों, कोई अहसान कर रहे हों। व्यंग्य पर व्यंग्य और अनु का घिधियाना- 'मेरी छात्राएं मुझे चाहती हैं सर, मेरा रिजल्ट हमेशा अच्छा रहता है।

अनु को लगता है जैसे अनगिनत जोंकें उसके शरीर से चिपक गई हों। वह सोचती है- कभी-कभी कैसे हो उठती है मन की गति। न जी सकता है आदमी न मर पाता.है। मानसिक द्वंद्व में कितनी मर्मांतक पीड़ा झेलता है। कभी-कभी उसे लगता है. जैसे वह अपनी जिंदगी की लाश को ढो रही है, लाश भी कैसी-सड़ी हुई। अनु मेहता जी के चैंबर में बैठी हुई थी- 'सर मेरा सिलेक्शन हो जाएगा ना?'

बड़ी मजबूरी और विवशता भरा स्वर था उनका- 'हां भाई, हो तो जाना चाहिए। जंभाई लेते चुटकी बजाते हए बोले थे मेहता जी- 'तुम्हारा काम-रिकॉर्ड तो बेहतर है ही, मुझसे जो कुछ बनेगा, मैं जरूर करूंगा। 'सर, यदि न हो तो बता दीजिएगा।' मेहता जी ने एक उचटती-सी निगाह उस पर डाली थी, तभी फोन की घंटी बज उठी।

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मेहता जी बात करने में मशगल हो गए। बीच-बीच में वे अनु की तरफ देख लेते। अनु का दिल धक-धक करने लगा था। एक क्षण को मेहता जी की आंखें सिकुड़ी थीं, फिर वे सहज हो गए। 'सर, कहीं यह फोन नौकरी से संबंधित तो...' आगे के शब्द रुंधे गले में दबे रह गए थे... तुम्हारी... नहीं-नही। ये तो किसी अन्य का था। केबिन से बाहर निकलते ही अन के फोन पर वाट्सएप मैसेज आया...मैसेज में लंबी रूपरेखा लिखी गई थी।

मजबूरियां गिनाई गई थीं। अनु को लगा कि शायद यही उसकी नियति है और एक बार फिर उसे निराशा ही हाथ लगी थी। बोझिल मन से उसने मेहता जी का मैसेज न चाहकर भी पढ़ना जारी रखा...आखिर में लिखा था 'आपकी योग्यता को देखते हुए एक नई पोस्ट क्रिएट की जा रही है। यू आर सिलेक्टेड...।'

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