सफलता का सूत्र best Motivational story in Hindi for kids.


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Hindi kahani- सफलता का सूत्र

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प्रियांशी पढ़ने में तेज थी लेकिन एग्जाम में फर्ट नहीं आ पाती थी, जबकि वह बहुत चाहती थी कि फर्ट आए। स्कूल में उसकी मैडम ने बताया कि सफलता के लिए वह सपना जरूर देखे। फिर क्या था, उसने सपना देखना शुरू कर दिया। फिर भी वह फर्ट न आई। ऐसा क्यों हुआ प्रियाशी के साथ? प्रियांसी सातवीं क्लास में पढ़ती थी। 

वह खेल-कूद में बहुत तेज थी। लेकिन पढ़ाई में वह उतना अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाती थी, जितना वह चाहती थी। प्रियांशी हमेशा सोचती रहती थी 'काश! मैं भी क्लास में फर्स्ट आऊं। मुझे भी मैडल मिले।' वह बस सोचती रह जाती, बाजी कोई और ही मार ले जाता। 

इसलिए प्रियांशी उदास रहने लगी थी। एक दिन कुसुम मैम ने क्लास में बच्चों को बताया कि सफलता कैसे प्राप्त की जाती है। उन्होंने बताया, 'हमें सबसे पहले सपने देखने चाहिए अगर हम सपना देखना शुरू कर देंगे तो सफलता को प्राप्त करने में कभी पीछे नहीं रहेंगे।' मैम आगे भी बहुत कुछ बता रही थीं। लेकिन घंटी बज जाने के कारण में बच्चे हल्ला करने लगे। प्रियांशी को है 

ज्यादा कुछ सुनाई नहीं दिया। उसने बस यही सुना-समझा कि सफल होने के लिए हमें सपने देखने चाहिए। प्रियांशी अब बस सफलता के बारे में सोचती। रात-दिन यही सपने देखती कि,वह क्लास में फर्स्ट आई है, उसे अवॉर्ड मिल रहा है। उसके मम्मी-पापा बहुत खुश हैं। 

प्रियांशी के पापा ने उसके क्लास में फर्स्ट आने पर 
साइकिल गिफ्ट की है। प्रियांशी की फोटो स्कूल के नोटिस बोर्ड पर लगी है। प्रियांशी दिन-रात सपनों में खोने के कारण पढ़ने में कोई विशेष ध्यान भी नहीं दे पा रही थी, क्योंकि उसे सपने देखकर ही एक सुख मिल रहा था। वह परिश्रम करने की तो सोच ही नहीं रही थी। 

समय बीतता चला गया प्रियांशी के एग्जाम हो चुके थे। उसे लगा इस बार वो ही फर्स्ट आएगी। लेकिन इस बार भी ऐसा नहीं हुआ। प्रियांशी बस पासिंग मार्क्स लेकर आई थी। यह देखकर प्रियांशी रोने लगी। कुसुम मैम प्रियांशी के पास आईं, उन्होंने पूछा, 'बेटा क्या हुआ, 

क्यों रो रही हो?' प्रियांशी ने आंसू पोछते हुए बताया, 'आपके कहे अनुसार मैंने साल भर फर्स्ट आने के सपने देखे लेकिन मैं फर्स्ट नहीं आ सकी।' कुसुम मैम यह सुनकर पहले तो हंसीं फिर प्रियांशी को समझाते हुए बोलीं, 'बेटा केवल सपने देखकर ही सफलता नहीं मिलती, बल्कि हमें सफल होने के लिए रात-दिन मेहनत करनी पड़ती है। 

सपने हमारी सफलता का मार्ग तैयार करते हैं और परिश्रम उस मार्ग को तय करता है, तब हमें सफलता प्राप्त होती है। अब तुम आठवीं में पहुंच गई हो। इस साल तुम सपने भी देखो और खूब मेहनत भी करो। देखना तुम जरूर फर्स्ट आओगी।' प्रियांशी सफलता का रहस्य जान चुकी थी। उसने सपने देखने के साथ परिश्रम करने का संकल्प भी ले लिया था।


Hindi kahani- बच्चे जो देखते हैं वही सीखते हैं
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बच्चे शब्द नहीं व्यवहार समझते हैं सहनशील बनो कहने से ज्यादा असर होता है ।सहनशीलता भरा व्यवहार करने से।

मै हमेशा से अपने सास-ससुर के साथ ही रहती रही हूं। बहुत सालों तक बहुत अच्छा सामंजस्य था मुझमें और मेरी सासू मां में। हम दोनों मां-बेटी की तरह रहते थे, परंतु जैसे- जैसे सासू मां की उम्र बढ़ी, अपनी शारीरिक
समस्याओं के कारण वे चिड़चिड़ी हो गईं। इधर मेरी भी उम्र बढ़ रही थी सो कभी-कभी उनकी चिड़चिड़ाहट पर मेरे सब्र का बांध टूटने लगता।

और मेरी उनसे बहस हो जाती। मेरे पति मुझे समझाते कि मां की परेशानियों को समझो और उन्हें जवाब मत दिया करो। मैं कोशिश तो करती पर संभव न हो पाता था। ऐसे में एक दिन जब सासू मां से मेरी बहस हुई तो मेरे दोनों बेटे, जो तब तक काफ़ी समझदार हो चुके थे, मुझ पर बहुत नाराज हुए।

उन्हें अपनी दादी की जगह मेरी ही ग़लती महसूस हो रही थी। बच्चों के द्वारा मुझे दोषी ठहराए जाने से मुझे बहुत दुख हुआ। पर फिर मुझे अहसास हुआ कि सच ही तो है। मैं खुद ही अपने समझदार होते बच्चों को उनकी दादी के प्रति असहनशीलता दिखा कर कैसे संस्कार दे रही हूं? जब मेरे और सासू मां के संबंध बहुत मधुर थे।

तब तो वे छोटे ओर नासमझ थे, अब समझदार हुए हैं तो मेरा ख़राब व्यवहार देख रहे हैं। वे भी जब किसी बुजुर्ग का उम्र की वजह से चिडचिडाना देखेंगे तो मेरी तरह ही
व्यवहार करेंगे। तब मैंने निश्चय किया कि मुझे सहनशील बनना होगा। उस समय अपनी सासू मां को प्यार देना होगा तभी मैं अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकूँगी। 

दरअसल बड़ी उम्र में बुजुर्ग, बच्चों जैसे हो जाते हैं, उनकी जिद और नाराजगी को सहना और उन्हें खुश रखने का प्रयास करना जरूरी है। मैंने भी किया और मेरे प्रयासों का पारितोषिक भी मुझे मिला। अब मेरे बच्चे भी मेरा बहुत ध्यान रखते हैं। मेरी और पति की कोई बात नहीं टालते और हमारी नाराज़गी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं करते।

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