जीत हुई हार की best Motivational story in Hindi for kids.

Hindi kahani- जीत हुई हार की

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जय एक नहीं कई बार हर्ष से रेस में हारा। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह रोज-रोज इतने अभ्यास के बाद भी क्यों हारता है। अंत में हर्ष ने ही उसे उसकी वो बड़ी कमी बताई, जिसके कारण वह हारता था। क्या थी यह कमी? जय अपनी कमी जानने के बाद क्या हर्ष से रेस में जीत पाया?                       

जय इस बार भी हर्ष को हराने की कसम खा चुका था। दोनों में रेस शुरू हो चुकी थी। दोनों अपनी पूरी ताकत से दौड़ रहे थे। दोनों के दोस्तों में भी बड़ा उत्साह-जोश था। वे न केवल अपने-अपने दोस्त की हौसला अफजाई कर रहे थे बल्कि अपने दोस्त को ही जीतता देखना चाहते थे। 

पिछले कई बार से हर्ष ही रेस जीतता चला आ रहा था और जय हारता। हर्ष से ज्यादा जय अभ्यास करता था। वह रोज सुबह पांच बजे उठ जाता और चुपके से दौड़ने चला जाता था। जय किसी को दिखाकर कोई भी काम नहीं करता था। वह सोचता था कि ऐसा करने से दूसरे लड़के भी दौड़ने का अभ्यास करेंगे और फिर वो जीत सकते हैं।

वह हर क्षेत्र में अकेले आगे बढ़ना चाहता था। जय हमेशा हर्ष को हराने की प्रतिज्ञा लेता और हर बार खुद हार जाता। दूसरी ओर हर्ष स्वभाव से सरल और विनम्र था। वह हमेशा अपने अभ्यास पर ध्यान देता और खूब मेहनत करता था। उसके मन में किसी के प्रति न कोई ईयां थी और न कोई द्वेष। 

वह कभी भी हारने-जीतने के बारे नहीं सोचता था। उस दिन रेस की ट्रैक पर जय ने हर बार की तरह हर्ष से हाथ मिलाया और वही पुराना संकल्प दोहराया, 'हर्ष, इस बार मैं तुम्हें जरूर हरा दूंगा।' हर्ष मुस्कराकर हर बार की तरह इस बार भी बोला, 'जय, ऑल द बेस्ट..!' रेस समाप्त हुई। 

जय एक बार फिर हार गया। इस बार जय बहुत दुखी था। अबकी वह हार को स्वीकार नहीं कर पा रहा था। वह जोर-जोर से रोने लगा। उसके दोस्त भी उसकी लगातार हार से बहुत दुखी थे। कोई समझ नहीं पा रहा था कि क्या किया जाए। जय को कैसे शांत कराया जाए। मायूस होकर जय घर वापस आया। 

पापा ने पूछा, 'क्या हुआ बेटा?' जय ने उदास स्वर में बताया, 'पापा! आज मैं फिर रेस में हर्ष से हार गया।' यह कहते-कहते वह अपनी मां से लिपट कर जोर-जोर रोने लगा। आज उसे दिल पर बहुत गहरी चोट लगी थी दरअसल, उसे आभास हो चुका था कि हर्ष से लगातार क्यों हार रहा है? जय के पापा उसी समय हर्ष के घर गए। 

उन्होंने हर्ष को उसके जीत की बधाई देते हुए पूछा, 'बेटा हर्ष, जय आज से पहले भी कई बार तुमसे रेस में हारा है लेकिन आज जैसा दुखी और मायूस मैंने उसे कभी नहीं देखा। एक बात बताओ बेटा, वह इतना अभ्यास करता है फिर हारता क्यों है? शायद तुम भी उसके जितना अभ्यास नहीं करते होगे।' हर्ष तुरंत बोला, 'हां अंकल, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं।
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मैं उसके जितना अभ्यास नहीं करता हूं। अंकल, जय हमेशा मुझे हराने की बात करता है। वह जब भी मिलता है, मुझसे एक ही बात कहता है कि हर्ष, इस बार तुम्हें जरूर हराऊंगा। वह कभी खुद को जिताने पर ध्यान नहीं देता, सिर्फ मुझे हराने पर ध्यान देता है। उसकी जो ताकत जीतने में लगनी चाहिए, 

वह ताकत मुझे हराने के बारे में सोचने पर लगा देता है। मैं कभी उसकी बात का बुरा नहीं मानता। मैं सिर्फ अपनी दौड़ पर ध्यान लगाता हूं। मेरी मां ने हमेशा यही सिखाया है कि अपना ध्यान जीत-हार पर नहीं, अपनी मेहनत और क्षमता बढ़ाने पापा जब घर वापस आए तो जय घर पर नहीं था।

उसकी मां से उन्होंने पूछा तो पता चला कि वह प्ले ग्राउंड पर गया है। पापा तुरंत प्ले ग्राउंड पर गए। वहां जय के सिवा कोई और नहीं था। जय एक जगह बैठा कहीं खोया हुआ था। उसे पता ही नहीं चला कि कब पापा वहां आ गए। पर लगाना चाहिए। तुम्हारी जीत हार तुम्हारी मेहनत और क्षमता ही तय करेगी।' हर्ष की बातें सुनकर जय के पापा के मुंह से निकला, शाबास बेटा, शाबास! बहुत अच्छे..!

पापा जब घर वापस आए तो जब घर पर नहीं था। उसकी मां से उन्होंने पूछा तो पता चला कि वह प्ले ग्राउंड पर गया है। पापा तुरंत प्ले ग्राउंड पर गए। वहां जय के सिवा कोई और नहीं था। जय एक जगह बैठा कहीं खोया हुआ था। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसके पापा आ गए। सहसा उसका ध्यान भंग हुआ, वह चौंका, 'पापा आप यहां?'

'हां बेटा! तुम्हें आज इतना निराश-हताश देखकर मुझे बहुत चिंता हो गई है। मुझे मालूम चल गया है कि तुम क्यों बार-बार हार रहे हो। तुम सिर्फ जीतने पर ध्यान दो किसी को हराने पर नहीं।' जय के पापा ने जय को प्यार से समझाया। 'मुझे मालूम है पापा! आप हर्ष के घर से आ रहे हैं। मुझे अपनी चूक का आभास हो गया है।' जय पापा से गले लगकर बोला।



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