Hindi kahani- पलायन best story in hindi language [motivblog]

Hindi kahani- पलायन

अरविंद के मन कोवो मेहनतकश समझ तो चुका था, लेकिन पूरी मुरवत के साथ उसने जो कहा, अरविंद के लिए संजीवनी बन गया।

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आज तो जो मन में ठाना है, वो करके ही रहूंगा। इतनी जिल्लत भरी जिंदगी से तो मर जाना ही बेहतर है।' बाइक को एलिस ब्रिज के किनारे खड़ा कर वो लोहे की फेंस के उस कटे हुए हिस्से की ओर बढ़ने लगा।

'हां, ये जगह सही है।' तीन-चार दिन से अरविंद रोज इस ब्रिज के चक्कर लगा रहा था। साबरमती में कूद अपने जीवन को समाप्त करने का पक्का मन वो बना चुका था।

मोबाइल निकाल अपनी पत्नी और तीन वर्षीय बेटी की फ़ोटो को एक बार फिर उसने निहारा। इनके सुखद भविष्य के लिए ही उसने अपनी सारी पूंजी लगा, ये स्टार्ट अप शुरू किया था। 

लेकिन क्या पता था एक वैश्विक महामारी सबकुछ लील जाएगी। शेष रह जाएगा तो कर्जदारों का तकाजा और घर के बिगड़ते हालात। 'कहां तक संभाल सकता हूं, अब नहीं सहा जाता। बस हिम्मत कर एक क़दम आगे बढ़ाना है, 

छपाक और सबकुछ एक झटके में ख़त्म। बस प्रीति की चिंता है। वो अपने मायके चली जाएगी। मेरी बेटी भी वहीं पल जाएगी। मेरे साथ भिखारियों-सा जीवन जीने से तो बेहतर ही है।

अरविंद के क़दम तेजी से बढ़े जा रहे थे। लेकिन अचानक ही ठिठक गया। आज फिर टूटी जाली के सामने वो अपंग हाथों में कुछ किताबें लिए बेचने के लिए खड़ा था। 

अरविंद के माथे पर पसीना छलक आया। 'उफ्फ, इसके जाने का इंतजार करना पड़ेगा।' वो वहीं खड़ा हो गया।

'साब, कूदने का मन है, तो ये जैकेट मुझे देते जाना नाहक ही भीग कर ख़राब हो जाएगी।' अरविंद उसे घूर कर देखने लगा। कल ये ही तो यहां बीड़ी-सिगरेट बेच रहा था और परसों छोटे-छोटे खिलौने, आज किताबें वो पैरों से अपंग ठहाके लगा कर हंसने लगा। 

'अरे साब, रोज आपको इस टूटी जाली को घूरते हुए देखता हूं, सो मजाक में कह दिया।' हलक में अटके थूक को गटक अरविंद ने कहा, 'तुम कल तो बीड़ी-सिगरेट बेच रहे थे।'

'हां साब, इस कोरोना ने तो कमर तोड़ दी है। मेरी यहीं
पान की थड़ी थी। दाल-रोटी चल रही थी। अब सबकुछ
हाथ से निकल गया। बची रह गई तो हिम्मत और उम्मीद।

बस, इनके सहारे रोज जुगाड़ कर कुछ नया करता हूं।
भागना तो सबसे आसान है साब, मुसीबत में डटे रहने
वाला ही जंग जीतता है।' मोटर साइकिल स्टार्ट करके अरविंद वहां से और अपने आत्मघाती विचारों से पलायन कर चुका था।


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