Hindi kahani- तलाश best inspirational story in Hindi

 

Hindi kahani- तलाश  best inspirational story in Hindi for "Change your mind

उम्मीदों के बोझ तले एक और मासूम दब गई थी, लेकिन उसने संघर्ष का रास्ता चुना...परीक्षाओं के माहौल में राह दिखाती सकारात्मक कहानी...

 

शहर के प्रसिद्ध कोचिंग सेंटर के बाहर कदम रखते ही अमृता को अपनी मां के कहे शब्द याद आ गए, 'याद
रखना अमता बेटा, मैं तेरा नाम आईआईटी टॉपर्स की
लिस्ट में ही देखना चाहती हूं। इससे कम तो मुझे कुछ
भी मंजूर नहीं!'

अमृता ने भी झट कह दिया, 'मम्मी, आप जानती हैं, मैंने आपका हर सपना पूरा किया है। आपने चाहा था कि मैं साइंस ही लूं और सीबीएसई टॉप करूं। मैंने आपके इन दोनों सपनों को पूरा किया है, जबकि मुझे साइंस में कोई रुचि नहीं थी!

' लेकिन मुझे सुकून तब मिलेगा जब तू आईआईटी टॉप करेगी...' उसकी मां ने एक-एक शब्द पर जोर देकर कहा था।

'आईआईटी में चयन ही काफी होगा मॉम? टॉपर अमंग दी टॉपर्स की आशा करना तो मेरे साथ ज्यादती होगी।' अमृता की बात पर उसकी मां की प्रतिक्रिया थी, "मैं ना तो सुन ही नहीं सकती। समझी बेटा!'

'अनमनी सी अमृता घर के बाहर निकली तो उसके पापा ने उसके कंधे सहलाए, 'चलो, बेटी!'

पहली बार अमृता ने घर छोड़ा था। रास्ते की। परिचित सड़कें भी आज उसको पराई सी लगने लगी थीं। अपने स्कूल के सामने से टैक्सी गुजरी तो वह आंखें फाड़कर उसे निहारने लगी। उसकी कितनी मधुर स्मृतियां इससे जुड़ी थीं। कुछ ही पलों में स्कूल दृष्टि से ओझल होता गया। उसे लगा, जीवन का एक सुनहरा अध्याय समाप्त हो गया है।

'बेटा, लो रेलवे स्टेशन आ गया।' पापा की बात पर उसका ध्यान भंग हुआ था। टैक्सी से उतरकर अनमने ढंग से सफ़र पर निकल पड़ी थी वह। पिता मधुकांत झटपट बोगी में सामान डालकर इत्मीनान से बैठ गए। फिर अमृता से कहा, 'बेटा हम कल सुबह तक नए शहर और फिर कोचिंग सेंटर पहुंचेंगे।'

अमृता ने उदास आंखों से अपने पिता को देखा. तो मधुकांत बेटी की उदासी ताड़ गए। पूछा, 'ख़ुश नहीं हो बेटी? मुझे बताओ, क्यों उदास हो?'

'पापा... मैं पढ़-पढ़ कर थक गई हूं।... उफ!

' मधुकांत ने अमृता को प्यार से समझाया, 'देखो बेटी, मैंने पहले भी कहा था, टेंशन में पढ़ाई नहीं होती, कोई कुछ भी कहे, कितना भी दबाव डाले, तुम्हें वही करना है, जो तुम्हारा मन कहता है। हर व्यक्ति के पढ़ने या कुछ भी करने की एक सीमा होती है, दूसरों की उम्मीदों के बोझ तले दबना ठीक नहीं।

अमृता मानो पापा से इसी बात की उम्मीद कर रही थी। 'पापा, मैं तो लिटरेचर लेकर प्रोफेसर बनना चाहती थी, पर मम्मी ने मेरी कहां सुनी? मुझे जो प्रेमचन्द की कहानियां, शेक्सपीयर के नाटक पढ़ने में आनंद मिलता है, वह इन बोझिल मैथ्स-साइंस में कहां?

'यदि ऐसा था तो साइंस क्यों लिया?' मधुकांत की बातों में सवाल कम और ग्लानि ज्यादा थी।

'पापा, मम्मी ने मेरी कहां सुनी? ऊपर से क्लास में मेरे दोस्तों ने भी साइंस ही चुना था।' ट्रेन अब अपनी गति से दौड़ रही थी।

कोचिंग सेंटर के बाहर पापा से विदा लेते समय
अमृता ने साहस बटोरकर कहा, 'पापा, यदि मैं सफल
नहीं हुई तो प्लीज मझे माफ़ कर देना।

' मधुकांत के माथे पर चिन्ता की लकीरें तैर गईं। वे बोले, 'बेटा, डोंट बी नर्वस... और हां, मुझसे वादा करो, सफलता नहीं भी मिले तब भी कोई ग़लत कदम उठाने के बारे में सोचोगी भी नहीं। अपने मन की बात जरूर शेयर करोगी। मुझे हर रोज तुम्हारे फोन या मैसेज की प्रतीक्षा रहेगी।'

पापा, आप बहुत अच्छे हैं!' कहते हुए अमृता उनके सीने से लिपट गई।

मधुकांत को रोज़ बेटी के फोन और मैसेजेस का इंतजार रहता। अमृता भी रोज का हालचाल पिता को बताती। 'यहां प्रतिस्पर्धा बहुत है, जितना पढ़ो, उतना कम है।' कभी लिखती- 'मैंने क्लास में आज सबसे ज्यादा मार्क्स पाए।' कभी बताती, 'मैं पढ़ जरूर रही हूं लेकिन बेमन से।

' एक दिन उसने लिखा, 'पापा, आज हमारी की एक लड़की ने सुसाइड कर लिया।' 

दूसरे दिन, 'मैं पढ़ नहीं पा रही हूं... लगता है जैसे डिप्रेशन में हूं।' 

मैसेज पढ़ते ही मधकांत ने फोन लगाया, 'बेटी, नकारात्मक विचारों को दिलो-दिमाग पर हावी मत होने दो। हम पढ़ें जरूर, मगर परिणाम की चिन्ता छोड़कर। चिन्ता मत करो।'

'ठीक है, पापा... मैं ऐसा ही करूंगी। आप चिन्ता न करें। मैं हमेशा खुश रहूंगी।' अमृता ने कहा।

सुनो बेटी, पढ़ते-पढ़ते जब थक जाओ तो आंखें बंद कर सोचो कि क्या करने से मन खुश रह सकता है- बस, उस समय रिलेक्स मूड में वही करो जो मन को पसंद हो, ताकि दिमाग तरोताजा हो जाए।'

एक हफ्ते बाद ही एक और लड़की ने सुसाइड कर लिया, अमृता अब और अनमनी हो गई थी। उस दिन कुछ न पढ़ पाई वह। बस, उस माहौल में एक कविता लिखी उसने-

'काफी परेशान है वह किताबों के बोझ से अपने प्रति अपेक्षाओं से साथियों के साथ प्रतिस्पर्धा से । शायद अपने आप से भी। वह अब जीना नहीं चाहती... सोचती रहती है नित्य आत्महत्या के नए' तरीके जो आसान हो कष्ट रहित भी हो ताकि तड़पना न पड़े उसे। छत की मुंडेर पर खड़ी सोचती है, 

मरने की बात एक यह भी तो है तरीका... तभी देखती है वह - कुछ शूकरों को नाली में मुंह मारते हुए विचार जन्म लेता है। वह भी ऐसी होती तो? उसे कोफ्त होती है! उधर, एक गाय भूखी-प्यासी, व्याकुल सी ढूंढ रही है कछ खाने को फिर चबाने लगती है। कागज का एक टुकड़ा तभी कुत्ता आकर लगता है भौंकने भागता है गाय के पीछे भाग पड़ती है गाय भी घबराई हुई सी।

गली के कुत्ते लड़ पड़े हैं बुरी तरह अचानक, अकारण ही। वह समझ नहीं पाती कौन सुखी है धरा पर? नीचे आ जाती है वह आत्महत्या का विचार मन से निकाल देती है। हां, वह संघर्ष करेगी । क्योंकि जान गई है वह इंसान होने का मतलब!'

अमृता को न जाने क्या सूझी कि कविता लिफाफे में बंद कर कोचिंग सेंटर के निदेशक की टेबल पर रख आई। उन्होंने इसे पढ़ा तो अपनी टिप्पणी के साथ कविता को बतौर विज्ञापन प्रमुख समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर प्रकाशित करवायाः

'पिछले दिनों दो छात्राओं द्वारा आत्महत्या की दुखद घटना ने मन-मस्तिष्क को झकझोर दिया था। इन दोनों घटनाओं की पीड़ा के परिप्रेक्ष्य में इस कोचिंग संस्थान की होनहार छात्रा अमृता द्वारा लिखी यह कविता प्रस्तुत है। धन्यवाद, अमृता।'

जिस दिन न्यूज पेपर में इसका प्रकाशन हुआ, अमृता की तो ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह एक ही दिन में कोचिंग सेंटर की सर्वाधिक लोकप्रिय स्टूडेंट बन गई मधुकांत ने अमृता का नाम पेपर में पढ़ते ही उसे मैसेज किया- 'मुझे तुम पर गर्व है बेटी... तुम्हारी चंद लाइनों से तुम्हारे साथियों को भी संबल मिलेगा। पढ़ाई के प्रेशर में अपनी जिंदगी ख़त्म कर लेना कहां की बुद्धिमानी है? तुम वाकई बहादुर हो।' 

कोचिंग संस्थानों में आईआईटी, नीट जैसी परीक्षाओं के लिए देश की कई जगहों से आए विद्यार्थियों के अभिभावकों में चिंता होना स्वाभाविक था। मधुकांत
का भी अपनी पत्नी रश्मि के साथ विचार-विमर्श हुआ।

'अपनी अमृता भी पिछले दिनों पढ़ाई के प्रेशर और हमारी अपेक्षाओं से तनाव में आ गई थी।

'हमारी उम्मीदें कब बोझ बन गई थीं, हमें पता ही
नहीं चला था।'
दोनों बस ईश्वर के शुक्रगुजार थे और अपनी बेटी पर गर्व कर रहे थे। रिजल्ट आया तो अमृता भी आईआईटी प्रवेश परीक्षा में सफल हो गई।

'सॉरी मां, मैं आपका टॉप करने का सपना पूरा करने में असफल रही।' अमृता की बात पर रश्मि ग्लानि से भर गई, 'बेटा बस करो। अब और उम्मीदों का बोझ नहीं लादेंगे तुम पर। तुम इंजीनियर बनना चाहो या लिटरेचर पढ़ना चाहो, तुम्हारी मर्जी। हम हर निर्णय में तुम्हारे साथ हैं।'


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